Wednesday, April 19, 2017

ज़िन्दगी से सवाले मुलाक़ात...


कभी जब ख़ामोश ख़ुद के साथ वक़्त गुज़ारती हूँ तो सोचतीं हूँ। ज़िन्दगी अपने ही मस्त अन्दाज़ में चल रही हैं। जो उसके नज़रिए से सही हैं वो वही कर रही हैं। कभी मेरे लिए भी नहीं सोचती हैं। आज कल मेरी ज़िन्दगी मुझसे थोड़ी ख़फ़ा सी हैं। सोचती हूँ ज़िन्दगी को शाम की चाय पर बुलाऊँ। चाय की चुस्कीयों के साथ अपने सवाल भी उससे पूछती जाऊँ...

आख़िर जब लगता हैं, मैं तुम्हें समझ गयी हूँ तुम बदल क्यों जाती हो???

जब भी तुम्हारे लिए कुछ अच्छा करने की सोचती हूँ, तुम ना जाने क्या सोचकर सब कुछ ख़राब कर आती हो???

क्या ज़रूरी हैं तुम हर बार, हर बात पर मुझे सबक़ दो। हर मुझे तुमसे अलग सोचने पर मजबूर कर दो।क्या तुम्हें नहीं लगता तुम मेरी ज़िन्दगी हो...

हम एक दूसरे से जुड़े हैं। तुम हर अपना अच्छा बुरा कैसे सोच लेती हो। तुम्हारे रूठने की वजह भी तो मुझे समझ नहीं आती...

एक दम से अनजानी सी बन कर आगे बढ़ जाती हो। शामों के ख़ाली होने का ग़म हैं या फिर सुबह की ओस को ना छू पाने की चुभन....

क्यों लगता हैं तुम्हें किसी ख़ास का होना ज़रूरी हैं, क्यों तुम्हें किसी की अनजाने की तलाश हैं...

तुम मेरे लिए ख़ास हो क्या इतना काफ़ी नहीं, क्यों भीड़ में खो जाना चाहती हों...

ऐसा क्या हैं, जो तुम मुझसे छुपा किसी अजनबी को बताना चाहती हों...

क्यों ख़ुद हार कर इस दुनिया से मुझे अंधेरे में छुपाना चाहती हों। शायद सवाल कुछ ज़्यादा हैं...

एक मुलाक़ात के लिए लेकिन ऐसे बिना जवाब दिए क्यों जाना चाहती हों???

चाय के कप के मेरे ये चंद सवाल हैं। वैसे बुलाया हैं,मैंने उसको मुलाक़ात के लिए जाने मेरी बात समझेंगी भी या नहीं। आख़िर मेरी ज़िन्दगी हैं मुझ जैसी ही है। इतना आसानी से शायद ना माने थोड़ा कोशिश में करती हूँ। थोड़ा कोशिश आप करिए। कभी आपसे टकरा जाए रास्ते में तो कहिएगा मुझसे मिलतीं हुई जाए।

Thursday, April 13, 2017

एक लड़का




एक दीवाना सा लड़का हैं
थोड़ा शायना थोड़ा शायराना सा लगता हैं
यूँ तो वाक़िफ़ नहीं मैं उससे
फिर भी बातों से जाना पहचाना लगता हैं

अक्सर अपने शब्दों में छुपाकर 
मुझसे उलझें से सवाल करता हैं।
इश्क़ ना करने की वजह पूछता है
कभी इश्क़ पर लिखने को मना करता है।

ना जाने कैसे मोहब्बत हो गयी है तुमसे
तुम्हें चुपके से पढ़ने की आदत हो गयी मुझे
चाहता हूँ तुम्हें क्या ये ख़ता हैं मेरी
अगर ख़ता ये हैं तो क्या सज़ा हैं मेरी

क्यों तुम मुझे चाहती नहीं 
क्यों मेरी लिखीं मोहब्बत में ख़ुद को पढ़ पाती नहीं
कहती हो मोहब्बत खुदा हैं 
तो क्यों सजदे में सर को झुकाती नहीं।

तलाशती हो जिस इश्क़ को तुम सारे जहाँ में 
लिखकर भी जिसे तुम समझ पातीं नहीं
वो तलाश कभी तो मुझ पर रुके 
लेकिन तुम्हारी नज़र मुझ तक आती नहीं।

तुम ही बता दो कैसे करूँ इश्क़ तुमसे 
जो मेरे जज़्बात तुम को भी समझ आए कभी
हर बार इनकार पर होता है दर्द कितना 
खुदा ना करे वो इनकार तुम्हारी ज़िन्दगी में आए कभी।।